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शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

शमशेर बहादुर सिंह की काव्य भाषा में बिम्ब विधान

स्वातंत्र्योत्तर  हिन्दी कविता में जैसे विषय बदले, वस्तु बदली और कवि की जीवन-दृष्टि बदली वैसे ही षिल्प के क्षेत्र में रूप-विधान के नये आयाम भी विकसित हुए। कविता की समीक्षा के मानदण्डों में एक बारगी युगान्तर आया और नये ढंग पर कविता की इमारत खड़ी की गई। कवि की अनुभूतियॉं नये अप्रस्तुतों और प्रतीकों को खोजते-खोजते बिम्ब के नये धरातलों को उद्घाटित करने में समर्थ हुई। कविता की जीवन्तता में प्राणषक्ति के रूप में बिम्ब ने अपना स्थान और महत्व पाया।

प्रतीक और अप्रस्तुत तो प्रारम्भ से ही कविता की समीक्षा के प्रतिमानों के रूप में स्वीकृत थे, अब बिम्ब भी कविता के मूल्यांकन की कसौटी के रूप में स्वीकारा जाने लगा। यों तो बिम्बों के निर्माण और चयन की प्रक्रिया संस्कृत साहित्य में ही प्रचलित थी, किन्तु तत्कालीन कवियों और समीक्षकों ने, बल्कि आजादी से पहले तक हिन्दी के समीक्षकों ने भी बिम्ब को काव्य का प्राणतत्व नहीं माना था। आजादी केे बाद कई नये संदर्भ, कई नये षैल्पिक प्रतिमान सामने आये। इसका कारण पाष्चात्य साहित्य का प्रभाव तो था ही, विदेषों में चल रहा बिम्बवादी आन्दोलन भी था। छायावादियों ने भी अप्रत्यक्षतः षिल्प के अंग के रूप में ‘चित्रत्व’ को स्वीकार कर लिया था। सुमित्रानन्दन पन्त ने जब काव्य-भाषा के विवेचन के दौरान चित्रभाषा के प्रयोग की बात कही थी तो प्रकारानतर से बिम्ब को ही काव्य-षिल्प के अंग और आलोचना के प्रतिमान के रूप में स्वीकार किया था। आचार्य षुक्ल भी बिम्ब को स्वीकृति दे चुके थे। उन्होंने ‘चिन्तामणि’ के एक निबन्ध में लिखा था, ‘‘काव्य का काम है कल्पना में बिम्ब या मूर्तभावना उपस्थित करना’’1: स्पष्ट शब्दों में काव्य कल्पना-चित्र नहीं है, वरन् अनुभूतियों का मूर्तिकरण है।

बिम्ब काव्य-भाषा की तीसरी ऑंख है, जो मात्र गोचर ही नहीं, किसी अगोचर तत्चेतसा स्मरति नूनमबोधपूर्व (कालिदास-पहले से जो अवबोधन हो उसकी स्मृति)-रूप से, एक ओर कारयित्री और दूसरी ओर भावयित्री भाषा के लिए उपलब्ध करती है।

बिम्ब शब्द का अर्थ छाया, प्रतिच्छाया, अनुकृति या शब्दों के द्वारा भावांकन है। बिम्ब अंग्रेजी के इमेज शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। सी0डी0 लेविस के अनुसार-

“The poetic image is more or less a sensuous picture in words, to some degree metaphorical, with an undernote and some human emotion, in its context but also charged with releasing into the reader a special poetic emotion or passion.”

अर्थात् काव्यात्मक बिम्ब एक संवेदनात्मक चित्र है जो एक सीमा तक अलंकृत-रूपतामक भावात्मक और आवेगात्मक होता है। लीविस ने बिम्ब को भावगर्भित चित्र ही माना है।2

डा0 नगेन्द्र के अनुसार, ‘‘बिम्ब किसी अमूर्त विचार अथवा भावना की पुनर्निर्मिति।3

एजरा पाउण्ड के अनुसार, ‘‘बिम्ब वह है जो किसी बौद्धिक तथा भावात्मक संष्लेष को समय के किसी एक बिन्दु पर संभव करता है।’’4

हिन्दी की नयी कविता-धारा के कवि पष्चिम के काव्य और काव्यान्दोलनों से परिचित थे। ‘तार सप्तक’ में प्रभाकर माचवे ने अपनी कविता को ‘इम्प्रेषनिस्ट’ अथवा बिम्बवादी घोषित किया। फिर भी तीसरी सप्तक के कवि केदारनाथ सिंह से पहले बिम्ब-विधान को किसी ने अपने वक्तव्य में प्रमुखता नहीं दी थी। केदारनाथ सिंह ने घोषित किया कि ‘‘कविता में मैं सबसे अधिक ध्यान देता हूॅं बिम्ब-विधान पर।’’5

एक आधुनिक कवि की श्रेष्ठता की परीक्षा की कसौटी जहॉं अज्ञेय ‘षब्दों का आविष्कार’ को मानते हैं, वहीं केदारनाथ सिंह ‘बिम्बों की आविष्कृति’ को। अपनी पुस्तक ‘आधुनिक हिन्दी में बिम्ब विधान का विकास’ में उन्होंने बिम्ब के प्रतिमान पर छायावाद से लेकर प्रयोगवाद तक के साहित्य की परीक्षा की है। शमषेर की कृतियों में बिम्ब अधिक सजीव और ऐन्द्रिय हैं। उनके समकालीन रचनाकार बच्चन, अज्ञेय, अंचल, दिनकर, नरेन्द शर्मा की कृतियां अपनी बिम्बात्मक गुणात्मकता के कारण ही मूल्यवान हैं। शमषेर के काव्य में बिम्ब अधिक संष्लिष्ट और गहराई लिए हुए है। भले ही उसका क्षेत्र सीमित हो किन्तु इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि वे अनुभूति और विचार से संबद्ध होने के कारण अपना औचित्य लिए हुए हैं।

शमशेर के बिम्ब रंग-ध्वनि-गंधपूर्ण हैं। उनके काव्य में नारी की मांसलता और प्रकृति की सुन्दरता के साथ कहीं-कहीं उनके बिम्ब यथार्थपरक स्वच्छन्द दृष्टि के सूचक हैं। शमशेर की कविता में लौकिक बिम्बों के साथ-साथ अलौकिक से बिम्बों की सृष्टि भी हुई है। शमशेर के काव्य में वस्तु या प्राकृतिक उपादानों का मूर्तकरण-मानवीकरण हुआ है, जो एक प्रकार की बिम्बात्मकता ही है। शमशेर कविता में जहॉं कल्पना है, वहॉं बिम्ब अधिक प्रभावषाली हैं। ‘‘कल्पना वह शक्ति है जो सर्वप्रथम कवि का वर्ण्य-विषय या वस्तु से सीधा साक्षात्कार कराती है।6

शमशेर की काव्य-भाषा प्रधानतः बिम्बात्मक है। सतर्कता के कारण वे बिम्बों का चयन बड़ी कुषलतापूर्वक कर सकते हैं। उनकी कुछ कविताएं और कुछ और कविताएं कृतियों के अलावा ‘काल तुमसे होड़ है मेरी’, ‘बात बोलेगी’ में भाषिक संवेदना के साथ बिम्बों-प्रतीकों का कौषल बहुत प्रभावषाली है। इस वैषिष्ट्य के बावजूद अपनी बनावट में शमशेर की कविता बिम्बों-प्रतीकों, रूपकों-उपमानों के सूक्ष्म संवेदन और चिन्तन-मनन की गहराई में डूब कर बखूबी समझी जा सकती है। उनकी काव्यात्मक संवेदना और रचनात्मक चेतना जिन वर्ण्य-विषयों को छूती है वे बिम्ब बनते हैं। उनके बिम्ब-विधान को अग्रांकित कोटियों में रख सकते हैंः-
1. प्रकृति-बिम्ब 2. गंध बिम्ब3. आस्वाद्य बिम्ब 4. नाद बिम्ब5. दृष्य बिम्ब 6. स्पर्ष बिम्ब7. आद्य बिम्ब 8. स्मृति बिम्ब9. भाव बिम्ब 10. अप्रस्तुत बिम्ब


प्रकृति बिम्ब
शमशेर की कविता में प्रायः प्रकृति बिम्बों के साथ अन्य छोटे-छोटै बिम्बों का सुन्दर समन्वय हुआ है। उनके बिम्ब जन-जीवन के साधारण व्यापार को भी कहीं असाधारण अर्थवत्त प्रदान करते हैं। उनके प्रकृति बिम्बों में संष्लिष्ट रोमानी बिम्बों की मोहकता एवं मार्मिकता है। ये या ऐसे बिम्ब कहीं-कहीं कल्पनाजनित होकर भी अंततः यथार्थ से रूबरू कराते हैं, कहीं यथार्थपरक होकर भी कल्पना से लगते हैं। उनमें सघनता संष्लिष्टता है-वे वैज्ञानिक और आधुनिक जीवन से सम्बद्ध हैं। ‘एक नीला दरिया बरस रहा’, ‘सारनाथ की एक शाम’, ‘सागर तट सौन्दर्य’, ‘एक पीली शाम’, ‘ऊषा’, ‘पूर्णिमा का चॉंद’, शाम होने को हुई, ‘सुबह रात्रि’, गीली मुलायम लटें’, ‘बसन्त आया’ आदि कविताएं ऐसी हैं। ‘एक नीला आइना बेठोस’, ‘सूर्यास्त’ और ‘सागर तट’ कविता पंक्तियों में प्रकृति बिम्बों का बड़ा उदात्त चित्रण है-
(1) एक नीला आइना बेठोस सी यह चॉंदनी और अन्दर चल रहा हूॅ मैं उसी के महातल के मौन में। मौन में इतिहास का कन किरन जीवित, एक, बस। (कुछ कविताएं, पृ0 21)
‘‘शमशेर के प्रकृति चित्रण में अतियथार्थवादी झलक बार-बार मिलती है। प्रकृति जितनी उनसे बाहर है, उतनी ही भीतर है। यह चित्रण यथार्थ है तो दूसरा अतियथार्थ। कविता में वर्णन की परम्परा और अनुभव का उन्मेष दोनों घुलते-मिलते हैं, पर शमशेर के यहॉं महत्व दूसरे का है। शायद यही कारण है कि प्रकृति चित्रण में उनका लगाव जितना जल था कि आकाष से है उतना मिट्टी से नहीं।’’7
(2) पी गया हूॅ दृष्य वर्षा काः हर्ष बादल का हृदय में भर कर हुआ हूॅ। हवा सा हल्का। धुन रही थीं सर व्यर्थ व्याकुल मत्त लहरें (कुछ कविताएं, पृ0 37)
शमषेर में विराट प्रकृति आत्मीय कैसे हो उठती है, इसका अच्छा साक्ष्य उन की प्रसिद्ध कविता ‘सागर तट’ प्रस्तुत करती है। जल, पर्वत और वर्षा का व्यापक सन्दर्भ लेकर कवि ने उनसे एक घरेलू बिम्ब की रचना की है। प्रेम की मनोभूति पर इनकी अंतर्प्रक्रिया कल्पना को हौले से सक्रिय करती है-
(3) चॉंदनी में धुल गये हैं बहुत से तारे बहुत कुछ धुल गया हूॅ मैं। बहुत कुछ अब। - 0 - 0 - चल रहा है जो। शान्त सा इंगित सा न जाने किधर.............................................(कुछ कविताएं, पृ0 21)
(4) व्योम में फैले हुए मेहराब के विस्तार स्तूप औ, मीनार नभ को थामने के लिए उठते हुए। विकटतम थे अति विकटतम विगत के सोपान पर्वत श्रृंग (चुका भी हूॅं मैं नहीं, पृ0 33)
(5) पंक्तियों में टूटती-गिरती चॉंदनी में लौटती लहरें बिजलियों-सी कौधती लहरें मछलियो-सी बिछल पड़ती तडपती लहरें बार-बार (कुछ कविताएं, पृ0 38)


गंध बिम्ब

घ्राण-विषयी बिम्ब गन्घ-विषयक अप्रस्तुतों के माध्यम से घ्राण-विषय अनुभूति को उद्बद्ध करते हैं और उसके समग्र प्रभाव को संवेदना के आधार पर मूर्तिमत्ता प्रदान करते हैं। दृष्य को प्राणवत्ता देने में गन्ध योजना सहायक सिद्ध होती है।
(1) धुऑ। धुऑं। सुलग रहा (कुछ कविताएं, पृ0 40)
(2) जल रहा। धुऑ धुऑं गवालियार के मजूर का हृदय (वही, पृ0 41)
(3) सुलगता हुआ पहरा या फानूस? (कुछ और कविताएं, पृ0 144)
(4) सीने में सूराख हड्डी का। ऑंखों में घास-काई की नमी। (वही, पृ0 154)
(5) थी महक। ष्षराब की (वही, पृ0 86)


आस्वाद्य बिम्ब

‘‘दृष्य को स्वाद के स्तर पर अनुभव करना तथा कराना कल्पना व्यापार का सबसे कठिन कार्य है।’’8 शमशेर के काव्य में स्वाद संवेदना की कलात्मक अभिव्यक्ति हुई है इसे ‘रासायनिक’ बिम्ब भी कहते हैं। स्वाद-संवेदना के अनेक चित्र उनकी कविता में मिलते हैं-
(1) हल्की मीठी चा सा दिन मीठी चुस्की सी बातें मुलायम बाहों का अपनाव। (कुछ कविताएं, पृ0 36)
शमशेर की कविता पढ़कर ‘अब यह हम पर है, कि हम अपने सामने और चारों ओर की इस अनन्त और अपार लीला को कितना अपने अन्दर घुला सकते हैं।’ ‘दूब’ कविता की ये पंक्तियॉं जैसे शमशेर की अपनी कविता का ही रूप प्रस्तुत करती हैं। शमशेर की समूची काव्य-प्रकृति उनके वर्ण्य, बिम्ब और लय में अभेद है। साहित्य-समीक्षा में यह बार-बार कही जाती है कि कवि की कोई पंक्ति उद्धृत करके अनिवार्यतः यह नहीं कहा जा सकता कि यह उस रचनाकार की संवेदना का प्रतिनिधित्व करती है।
(2) आखिर क्यों मुस्कुराते हैं शराबी अधर? (चुका भी हूॅं मैं नहीं, पृ0 36)
(3) नमक जैसे मैले संगमरमर का बादल (वही, पृ0 57)
(4) अभाव के व्यंग्य से। (षमषेरः प्रतिनिधि कवितायें, पृ0 19) जूते चबाता हुआ-सा मानो (षमषेर प्रति0 कवि पृ0 19)
(5) दिलों में जैसे मीठी फॉंसें (काल तुमसे होड़ है मेरी, पृ0 51)


रूप बिम्ब

कवि अपने भावातिरेक से प्रेरित होरक काव्य का सृजन करता है। काव्य की सफलता यही है कि वह वर्ण्य-विषय सम्बन्धी बिम्बों को पढ़ते ही ऑंखों के सामने चित्र से घूमने लगते हैं। रोमान्टिक कविताओं में रूप-बिम्ब की प्रधानता होती है।
(1) नील जल में या किसी की गौर झिलमिल देह जैसे हिल रही हो। (षमषेर की प्रतिनिधि कविताएं, पृ0 102)
ऊषा के जल में झलकता उज्ज्वल प्रतिबिम्ब जैसे राषि-राषि सौन्दर्य को अनन्त नील गहराइयों में परिव्याप्त कर रहा हो, ऊषा की सुन्दरता जादू या रहस्य की तरह फैल गई हो। विषेषता यह है कि जादू यहॉं कोई अतिप्राकृत तत्व नहीं है, वह पूरे तौर पर प्रकृति से उपजता है।
(2) बादलों की इन्द्रधनुषी हॅंसियॉं? (कुछ कविताएं, पृ0 49)
(3) काला काला ऑंख का तिल है जोत का द्वार! (चुका भी हूॅं मैं नहीं, पृ0 51)
(4) अपनी अजीब-सी खनक और चमक लिए गोरी गुलाबी धूप (कुछ और कविताएॅं, पृ0 158)


स्थिर बिम्ब

काव्य में स्थिर बिम्ब वस्तु के आकार, रूप व रंग को प्रस्तुत कर पाठक की राग चेतना को उद्बुद्ध कर, उसके मन को वस्तु की कल्पना के लिए प्रेरित करता है। पाठक के ऑंखों के सामने वस्तु रूपायित होती है। स्थिर बिम्ब में वस्तु, वातावरण, आकृति और अपनी रंग रेखाओं के साथ पाठक के सामने मूर्त रूप में प्रस्तुत होती है। स्थिर बिम्बों के सृजन के लिए कवि संज्ञा पद, विषेषण, अप्रस्तुत योजना, विषेषण, विपर्यय आदि विभिन्न प्रकार के उपकरणों की सहायता लेता है-
(1) ओ शक्ति के साधक अर्थ के साधक तू धरती को दोनों ओर से थामे हुए (चुका भी हूॅं मैं नहीं, पृ0 32)
(2) रवि! क्मल के नाल पर बैठा हुआ मानो एक एड़ी पर टिकाए मौन (वही, पृ0 70)
(3) हिलते-चमकते बहुत हरे छोटे-बड़े पेड़ मेरे चारों ओर खड़े। (वही, पृ0 85)
(4) जो कि सिकुड़ा हुआ बैठा था, वो पत्थर (कुछ कविताएं, पृ0 44)
(5) एक धुॅंधली बादल-रेखा पर टिका हुआ (कुछ और कविताएं, पृ0 128)
(6) दोपहर बाद की धूप-छॉंह में खड़ी इंतजार की ठेले गाड़ियॉं (वही, पृ0 131)


स्पर्ष बिम्ब

स्पर्ष बिम्ब का आधार करुणा-जनित वात्सलता है जिससे प्रभावोत्पादकता बढ़ जाती है। स्पर्ष बिम्ब के अन्तर्गत मनःस्थितियों, शारीरिक सम्बन्धों, क्रिया-व्यापारों, शरीरस्थ चेतना, संरचण, या अन्तःवृत्ति मांसल अभिव्यक्ति हुई है। इसलिए इसे आंगिक अथवा जैविक बिम्ब भी कहते हैं। ये बिम्ब मातृ-वात्सल्य के परिचायक हैं।
(1) जहॉ। उसने अपना सर रखा था तुम्हारे वक्ष पर वह स्थान बहुत ही मुकद्दस है। (काल तुमसे होड़ है मेरी, पृ0 64)
(2) गीली मुलायम लटें। आकाष सॉंवलापन रात का गहरा सलोना स्तनों के बिम्बित उभार लिए (कुछ कविताएं, पृ0 48)
(3) एक नीला आईना बेठोस सी यह चॉंदनी (वही, पृ0 21)
(4) खसर-खसर एक चिकनाहट हवा में मक्खन-सा घोलती है। (वही, पृ0 62)


दृष्य बिम्ब

शमशेर की रचनाओं में दृष्य बिम्बों की प्रधानता है। शमशेर की कविता में दीप्ति रंग-बोधक बिम्ब भी दृष्य बिम्बों के अन्तर्गत स्वीकार किए जाएंगे। प्रकृति चित्रों में मानवीकरण की प्रवृत्ति दृष्य बिम्बों को विष्वसनीयता प्रदान करती है। इनमें हवा, सॉंझ, चॉंद, तारे, पर्वत, नदी, घास, धूप आदि के चित्र अकेलेपन को व्यक्त करते हैं। शमशेरकविता में कई दृष्य- बिम्ब स्थिर चित्रों की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं तो कई इृष्य बिम्ब मनःस्थितियों के द्योतक हैं। दृष्य या चाक्षुक बिम्ब के परिप्रेक्ष्य में शमशेर-कविता में दीप्ति बिम्ब भी सुग्राह्य हैं-
(1) धूप कोठरी के आईने में खड़ी हॅंस रही है! (कुछ और कविताएं, पृ0 37)
रंग-योजना के प्रयोग में कवि ने विषेषकर लाल, नीला, पीला, हरा आदि रंगों का उपयोग किया है।
(2) नील आभा विष्व की हो रही है प्रतिपल तमस। विगत संध्या की रह गई है एक खिड़की खुलीः झॉंकता है विगत किसका भाव। बादलों के घने नीले केष चपलतम आभूषणों से भरे लहरते हैं वायु संग सब ओर। (चुका भी हूॅं मैं नहीं, पृ0 87)
(3) धूप में लिपटा हुआ है आसमान (कुछ कविताएं, पृ0 32)
(4) गरीब के हृदय टंगे हुए कि रोटियां लिए निषान (वही, पृ0 41)
(5) मैली, हाथ की धुली खादी सा है आसमान। (कुछ और कविताएं, पृ0 60)

शमशेर-कविता में मनोवैज्ञानिक बिम्बों की सृष्टि सुबोध सुग्राह्य है। कवि मन में सामान्य मनुष्य की तरह भाव-विचार, धारणाए और घटनाओं के बिम्ब-प्रतिबिम्ब बनते रहते हैं। मगर जब वह अपनी सृजनात्मक क्षमता से उसे शब्दायित करता है तो बिम्बों की रचना होती है। मनोवैज्ञानिक बिम्ब वाह्य वस्तु, आकार, रूप का प्रतिबिम्ब होते हैं। इसे मानस बिम्ब भी कहते हैं।


नाद बिम्ब

नाद बिम्ब की दृष्टि से प्राकृतिक ध्वनियों, वस्तु-ध्वनियों, संगीत ध्वनियों को शामिल कर सकते हैं। शमशेर-कविता में नाद बिम्बों का प्रयोग प्रभावषाली है।
(1) मेघ गरजे। और मोर दूर कई दिषाओं से बोलने लगे-पीयूअ! पीयूअ! (कुछ कविताएं, पृ0 20)
(2) हरहरा कर उठ रहा है नव जनमहासागर! (वही, पृ0 43)
(3) हवा में सन् सन् ज्योति के जो हरे तीखे बान च्ल रहे हैं। (चुका भी हूॅं मै नहीं, पृ0 36)
(4) पहली-पहली गुटरगूॅ गुटरगूॅ (काल तुमसे होड है मेरी, पृ0 71)


गति बिम्ब

शमशेर को गतिषील बिम्बों के चित्रण में अभूतपूर्व हस्तलाघव प्राप्त है। इनके माध्यम से उन्होंने बहिर्जगत की गति के सन्दर्भ में आनतरिक जगत की उस गत्वरता को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, जिसकी ओर इसके पूर्व बहुत कम रचनाकारों की दृष्टि गई थी। कहीं तो गति-अगति के बीच एक निष्चित बिन्दु पर सारे कार्य-व्यापार को केन्द्रित करके उन्होंने अद्भुत चमत्कार का सृजन किया है। ऊषा और संध्या संबंधी बिम्बों के चित्रण में हमने इस पर विचार किया है। शमशेर गति को प्रगति के साथ जोड़ते हैं-
(1) सीप-सी रंगीन लहरों के हृदय में डोल (कुछ कविताएं, पृ0 35)
(2) अनवरत् बह रही है। (वही, पृ0 45)
(3) तैरती आती बहार (वही, पृ0. 62)(4) सुर्ख फूल ओस में चुपचाप लुढ़कते चले जाते (चुका भी हूॅं मैं नहीं, पृ0 32)
(5) वह सागर सट्ठा जो, उठा, और और और (चुका भी हूॅं मैं नहीं, पृ0 71)
(6) जोकि सिकुड़ा हुआ बैठा था वो पत्थर सजग-सा होकर सरकने लगा आप से आप (कुछ और कविताएं, पृ0 36)
(7) यह रात फिसलन से भरी हुई है। (वहीं, पृ0 142)


स्मृति बिम्ब

मानव स्वभावतया अतीत प्रेमी होता है। वह अतीत की स्मृतियों को महत्वपूर्ण स्थान देता है। ‘‘अतीत कल्पना का लोक है, एक प्रकार का स्वप्न लोक हैः इसमें तो सन्देह नहीं।......स्मृतियॉ। हमें केवल सुखपूवर्ण दिनों की झॉकियां नहीं समझ पड़तीं। वे हमें लीन करती हैं, हमारा मर्म स्पर्ष करती हैं।’’9
(1) कहीं दूर पार से स्मृतियां बहुत-सी इकट्ठा हो रही हैं। (काल तुमसे होड है मेरी, पृ0 53)
(2) यह आसमान चूम रहा है मेरी चौखट मैं चॉंद और सूरज को निकालूॅं अलमारी में रखे हुए एलबम से (कुछ और कविताएं, पृ0 143)
(3) आज कहॉं वे गीत जो कल थे गलियों-गलियांे में गाए गए (काल तुमसे होड़ है मेरी, पृ0 42)
क्रिया बिम्ब
(1) एक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलता पूरब से पष्चिम को एक कदम से नापता बढ़ रहा है। (कुछ कविताएं, पृ0 87)
(2) चुम्बन की मीठी पुचकारियॉं खिल रही कलियों को फूलों को हॅंसा रही (कुछ कविताएं, पृ0 62)


आद्य बिम्ब

शमशेर के काव्य बिम्बों की व्यंजना विषिष्ट है। उन्होंने मानस बिम्बों के साथ भावमय वैचारिक और रोमानी विविधवर्णीय बिम्बों की उम्दा अभिव्यक्ति की है। इनके अतिरिक्त उनके काव्य में प्राचीन पुराकथाओं (पुराख्यानों) से संबंधित बिम्ब भी प्रस्तुत हुए हैं। ‘‘आद्य बिम्ब सामूहिक अचेतन की सृष्टि होते हैं......इनकी प्रकल्पना युग ने की है। ये आदि अनुभूतियों के संस्कार रूप में आज भी मानव जाति के अचेतन मन में विद्यमान हैं, और अनेक प्रकार से अपनी अभिव्यक्ति करते हैं।’’10 आद्य-मिथ की सृष्टि की दृष्टि से उनके काव्य में सूर्य, चॉंद, धूप, मछली, सॉंप, षिव आदि के बिम्ब आए हैं। आद्य बिम्ब कविता को कालजयी बनाने में सहायक होते हैं। उसे विषिष्ट अर्थ-सौन्दर्य सौंपते हैं। शमषेर की ‘वाम वाम वाम दिषा’ कविता इसका श्रेष्ठ उदाहरण है।
(1) एक ऋतुओं में विहॅंसते सूर्य काल में (तम घोर)- (कुछ कविताएं, पृ0 15)
(2) क्या षिवलोक के बीच कोई विभाजक दीवार खडी की जा सकती है सिवाय सच्चाई की उज्ज्वलता के (चुका भी हू मैं नहीं, पृ0 50)
(3) वरुणा के किनारे एक चक्रस्तूप है शायद वहीं विष्व का केन्द्र है (वही, पृ0 31)
(4) इक मौन कमल खिलता है और नयी लहरियों में लगातार हॅंसता है। (वही, पृ0 107)
(5) बिजलियों-सी कौंदली लहरें मछलियों-सी बिछल पड़ती तड़पती लहरें बार-बार (कुछ कविताएं, पृ0 38)


अलंकृत बिम्ब

अलंकृत बिम्ब कल्पनाप्रसूत होते हैं और काव्य में कलात्मक सौन्दर्य की सृष्टि करते हैं। ‘‘अलंकृत बिम्बों का एकमात्र आधार कलात्मक सौन्दयै होता है किसी चमत्कारपूर्ण अथवा दूरान्वयी कल्पना द्वारा इस श्रेणी के बिम्बों की सृष्टि होती है।’’11 दरअसल, अलंकृत बिम्ब वर्ण्य वस्तु-प्रसंग-दृष्यांष को अलंकारों के द्वारा प्रत्यक्ष करते हैं। शमषेर की कविता में भौतिक-प्राकृतिक दोनों तरह के दृष्यों-बिम्बों की अभिव्यक्ति हुई है, जिनसे मानसिक विनोद या रस का अनुभव होता है।
अलंकृत बिम्बों में अप्रस्तुत कवि-कथ्य को अर्थवान बनाते हैं। इसमें अनुभूतियों और अर्थों का भाव सूक्ष्म स्तर पर प्रतिष्ठित होता है। यदि किसी कथ्य-अनुभव का सामान्य वर्णन किया जाए तो वह पाठक को विषेष प्रभावित नहीं कर सकता और न ही उसमें अधिक सम्प्रेषणीयता होती है। काव्य में अलंकार विधान की विषिष्टता प्रतिपादित की गई है। शमषेर की कविता में अप्रस्तुत विधान की भूमिका महत्वपूर्ण है। उनकी कविताओ की अग्रांकित पंक्तियों में विपर्यय का उपयोग कितना सुन्दर हुआ हैं। ‘‘कविता में बिम्ब भिन्न-भिन्न कोणों पर रखे गए दर्पण जैसे होते हैं। ज्यों-ज्यों कविता का विषय विकसित होकर आगे बढ़ता है, वह अपने विविध रूपों में इन दर्पणों में प्रतिच्छायित होता है। ये दर्पण जादू के दर्पण हैं, वे केवल विषय-वस्तु को ही नहीं प्रतिच्छायित करते हैं, वे इसे नाम और रूप भी प्रदान करते हैं।’’12
(1) सूर्य मेरी पुतलियों में स्नान करता केष वन में झिल मिलाकर डूब जाता स्वप्न-सा निस्तेज गतचेतन कुमार (चुका भी हूॅ मैं नहीं, पृ0 24)
(2) एक नीला दरिया बरस रहा है और बहुत चौड़ी हवाएॅं मकानात है मैदान किस कदर ऊबड़-खाबड़ मगर एक दरिया और हवाएॅं मेरे सीने में गूॅज रही हैं। (चुका भी हूॅ मैं नहीं, पृ0 17)
(3) बादलों के घने नीले केष चपलतम आभूषणों से भरे लहरते हैं वायु संग सब ओर। अल्लमत यदि मैं संस्कृत में संध्या कर ली तो तू मुझे दोजख में डालेगा? (वही, पृ0 108)
(4) ईष्वर अगर मैनें अरबी में प्रार्थना की तू मुझसे नाराज हो जाएगा। (वही, प10 87)
अप्रस्तुत को प्रस्तुत करने के लिए कवि तुलना, सादृष्य, साम्य, विपय्रय, सान्निध्य, आवेग संकर्षण तथा एकरूपता के संयोग का सामान्यतः उपयोग करता है। छायावादोत्तर कवियों में गिरिजा कुमार माथुर, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, मुक्तिबोध, अंचल, सर्वेष्वर, श्रीकान्त वर्मा, राजकमल चौधरी, धूमिल आदि की कविताओं में इसका प्रायः प्रयोग हुआ है। शमषेर के काव्य में अप्रस्तुत कहीं-कहीं आकारमूलक रूप में भी प्रस्तुत हुआ है-
(5) षिला का खून पीती थी वह जड़। जोकि पत्थर थी स्वयं। सीढ़ियां थीं बादलों की झूलती टहनियों-सी। और वह पक्का चबूतरा, ढाल में चिकनाः सुतल था। आत्मा के कल्पतरु का? (कुछ और कविताएं, पृ0 155)
जिस प्रकार उन्होंने ‘पक्का चबूतरा’ को उपरोक्त कविता में आकार प्रदान किया है उसी प्रकार ‘सींग और नाखून’ कविता में आलंकारिक बिम्बों को यूॅ रूपायित किया है-
(6) सींग और नाखून लोहे के बख्तर कन्धों पर। सीने में सूराख हड्डी का। ऑंखों में घास-काई की नमी। एक मुर्दा हाथ पॉंव पर टिका उल्टी कलम थामे। तीन तसलों में कमर का घाव सड़ चुका है। जड़ों का भी कड़ा जाल हो चुका पत्थर। (कुछ और कविताएं, पृ0 154)
आकारमूलक अप्रस्तुत विधान की बड़ी प्रभावी प्रस्तुति नागाजु्रन, नरेष मेहता, कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह, जीवन प्रकाष जोषी, जगूड़ी, रमेष गौड़ की कविताओं में हुई है। इन कवियों ने नयेपन की तलाष में परम्परा की जीवन्तता को बिम्बायित किया है। उनकी कविता में जन-जीवन समाजधर्मी विविधवर्णीय रूप-रंग के बिम्ब प्रतीक हैं जो उन्हें समकालीन समवयस्क कवियों से अलग करते हैें।
शमशेर ने अप्रस्तुत विधान के अन्तर्गत उपमामूलक बिम्बों-चॉंदनी, सीपी, मोती, शंख, ओंठ, नारंगी, अधर, कुहरा, धूप, छॉंव, आदि के प्रयोग से ताजगी पैदा करने का सार्थक प्रयास किया है-
कुसुमों से चरनों का लोच लिए थिरक रही हैं भीनी भीनी सुगन्धियॉं (कुछ कविताएं, पृ0 63)
इसी प्रकार-
और दरिया राग बनते हैं।-कमल फानूस-रातें मोतियों की डाल-। दिल में साड़ियों के से नमूने चमन में उड़ते छबीले, वहॉं गुनगुनाता भी सजीला जिस्म वह- जागता भी। मौन सोता भी, न जाने एक दुनिया की। उम्मीद-सा। किस तरह! (वही, पृ0 65)

उक्त बिम्बों के अतिरिक्त शमषेर के काव्य में अप्रसृत और उदात्त बिम्बों का विधान भी है। अप्रसृत बिम्ब उक्त सभी बिम्बों से अलग प्रतीत होता है। इसमें शब्द-विस्तार या शब्द-बाहुल्य नहीं होता। कुल मिलाकर, शमषेर के काव्य का उत्त्रार्ध बिम्ब-बहुल है। ये कवि की अनुभूति को गहराई और ऊॅंचाई प्रदान करते हैं। उनके काव्य में जहॉ एक ओर वस्तुपरक यथार्थ बिम्ब है वहीं दूसरी ओर रोमानी यानी स्वच्छन्द बिम्बों की प्रकल्पना भी की जा सकती है। उनकी विता में प्रकृति के उपादानों और अनुभूतियों का बड़ा अनूठा तालमेल है। कहीं-कहीं साहचर्य-समन्वय भी व्यक्त हुआ है। कल्पना-षक्ति का सौष्ठव देखते ही बनता है। कलागत उपलब्धि के अर्थ में शमषेर की कविता अपना विषिष्ट मूल्य रखती है। इस दृष्टि से उनके काव्य में वाह्य उद्दीपन (षब्द-स्पर्ष-रस और गंध बिम्बों) के निर्माण की प्रक्रिया बड़ी सूक्ष्म है। यूॅं मूल अनुभूति की अतीतता का ज्ञान उनके बिम्बों में होता है।

बिम्बों का अस्तित्व मानसिक अर्थ में विषेष होता है। यदि बिम्ब स्वतन्त्र रूप से काव्य मंे आते हैं, तो वे उतने प्रभावी नहीे होते जितने होने चाहिए इसलिए इनकी रचना में सर्जक के विगत अनुभवों का अधिक योगदान रहता है।

शमशेर के काव्य में बिम्ब उसकी रचना तन्त्र के सम्पन्न और भाषा को समृद्ध करते हैें। उनके बिम्ब जीवन्त हैं। उनमें बासीपन नहीं है, ताजगी है। इन बिम्बों में उनका सौंन्दर्य बोध निहित है। जहॉ बिम्बात्मकता नहीं है, वहॉ गद्यात्मकता सी आ गयी है। शमशेर के बिम्ब-विधान की विषेषता है कि उनकी कविताओं में वर्ण्य-विषय और बिम्ब अनायास एक दूसरे पर आरोपित हैें। कह सकते हैं कि पूर्ववर्ती रचनाओं की अपेक्षा उत्तरवर्ती रचनाओं में (वायवियत के बावजूद) निर्मित बिम्ब लोकोन्मुखता लिए हैं। भाषा की सार्थक शक्ति-सहयोग पाकर वे पर्याप्त प्रभावषाली और आकर्षक बन गए हैं। उनके बिम्बों-प्रतीकों में विविधता, अर्थगर्भिता और प्रयोगधर्मिता है जो उन्हें छायावादोत्तर विषिष्ट रचनाकारों में एक नयी पहचान देती है।

मानव संसाधन विकास मंत्री श्री अर्जुन सिंह के शब्दों में, ‘‘शमशेर बहादुर सिंह आधुनिक भारतीय कविता के निर्माताओं में से एक थे, उन्होंने पूरी अर्धषती हिन्दी साहित्य की श्रीवृद्धि में समर्पित की। वे अपनी प्रयोगधर्मिता, विषिष्ट बिम्ब विधान और गहन मानवीयता के लिए स्मरण किए जाएंगे।’’12


बिम्ब विधान
सन्दर्भ सूची
1. चिन्तामणि - आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पृ0 2282. सी0डी0 लेविस - पोयटिक इमेज, पृ0 223. हैलेः डॉ0 नगेन्द्र द्वारा उद्धृत काव्यात्मक बिम्ब, पृ0 54. रेनेवेलेक एण्ड अस्टिन वारेन - थिअरी ऑफ लिटरेचर, पृ0 1875. कविता की तीसरी ऑंख - प्रभाकर श्रोत्रिय, पृ0 306. गिरिजा कुमार माथुरः काव्य दृष्टि और अभिव्यंजना - डा0 राहुल, पृ0 1537. रामस्वरूप चतुर्वेदी - नई कविताः एक साक्ष्य, पृ0 808. डा0 केदार नाथ सिंह - आधुनिक हिन्दी काव्य में बिम्ब विधान, पृ0 2109. आचार्य शुक्ल - चिन्तामणि प्रथम भाग, पृ0 15310. काव्य बिम्ब - डॉ0 नगेन्द्र, पृ0 1411. आधुनिक हिन्दी कविता में षिल्प - कैलाष वाजपेयी, पृ0 28512. शमषेरः कवि से बड़े आदमी - सं0 महावीर अग्रवाल, पृ0 113

- डॉ0 मानवी (कुषवाहा) मौर्य द्वारा वर्ष 2006 में लखनऊ विष्वविद्यालय, लखनऊ, उ0प्र0 से प्रो0 कालीचरण स्नेही के निर्देषन में ’’शमशेर बहादुर सिंह की काव्यभाषाः अनुषीलन’’ विषय पर पी.एच.डी. पूर्ण की। उपरोक्त लेख उक्त शोध कार्य का अंष है।

1 टिप्पणी:

sidheshwer ने कहा…

बहुत अच्छा लेख! बधाई!!