आधुनिक युग में अवधी भाषा के लोकप्रिय कवियों में 'गुदड़ी के लाल' का नाम आदर के साथ लिया जाता है। इनका वास्तविक नाम गुरु चरण लाल है। इनका जन्म 8 जनवरी सन् 1938 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के मलिकमऊ चौबारा गॉंव में श्री राम दयाल जी के घर में हुआ था।
'गुदड़ी के लाल' खड़ी बोली, क्षेत्रीय भाषा अवधी और माडर्न लैंग्वेज (हिन्दी-अंग्रेजी मिश्रित भाषा) के रचनाकार हैं। इनकी प्रथम काव्यकृति 'झलबदरा' थी। 'पलही बयारि' एवं 'छुट्टा हरहा' इनके अन्य प्रमुख कविता संग्रह हैं। इनकी तमाम रचनाऍं आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से प्रसारित हो चुकी हैं।
श्री लाल अवधी भाषा में प0 चन्द्रभूषण त्रिवेदी 'रमई काका' की परम्परा के कवि हैं। इनकी कविताओं में ग्रामीण जीवन के विविध रंग देखने को मिलते हैं। हास्य इनकी कविता का प्रमुख रस है।
यहॉं प्रस्तुत है उनके कविता संग्रह 'छुट्टा हरहा' की एक कविता 'हाल अब सबका भवा बेहाल' जिसमें भीषण गर्मी की ऋतु का वर्णन किया गया है-
गरम-रितु नाचै ताल-बेताल।
हाल अब सबका भवा बेहाल।
गरम ते तिनकौ रहा न जाय।
दुपहरी झल-झल-झल झल्लाय।
चराचर, जीव-जन्तु कुम्हिलॉंय।
कुसी-कासा तक गये झुराय।
झुरानें नदिया-नरवा-ताल।
हाल अब सबका भवा बेहाल।
भानु तनि ऑंख रहा देखाय।
घामु खुब अगिनि रहा बरसाय।
जरैं भुलभुलि मा दून्हौं पॉंय।
कनपटा-फार लूकु हहराय।
कुँवन का पानी गवा पताल।
हाल अब सबका भवा बेहाल।
बइठि गै कतहूँ हवा लुकाय।
पसीना चपर-चपर चुचुहाय।
अँधोरिया रहि-रहि धरि-धरि खॉंय।
घरइतिनि बेनिया दियो डोलाय।
छिदी सबधरि देहीं कै खाल।
हाल अब सबका भवा बेहाल।
इ आतप सबका रही सताय।
मुला कुछु का कसिके फलियाय।
धतूरा, छ्यूल, अर्क घघ्घाय।
भटकटइया खुलि के मुसकाय।
गरम होइगें 'गुदड़ी के लाल'।
हाल अब सबका भवा बेहाल।