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सोमवार, 23 मई 2011

गुदड़ी के लाल- अवधी कविता के सशक्‍त हस्‍ताक्षर

आधुनिक युग में अवधी भाषा के लोकप्रिय कवियों में 'गुदड़ी के लाल'  का नाम आदर के साथ लिया जाता है। इनका वास्‍तविक नाम गुरु चरण लाल है। इनका जन्‍म 8 जनवरी सन् 1938 को उत्‍तर प्रदेश के रायबरेली जिले के मलिकमऊ चौबारा गॉंव में श्री राम दयाल जी के घर में हुआ था। 

'गुदड़ी के लाल' खड़ी बोली, क्षेत्रीय भाषा अवधी और माडर्न लैंग्‍वेज (हिन्‍दी-अंग्रेजी मिश्रित भाषा) के रचनाकार हैं। इनकी प्रथम काव्‍यकृति 'झलबदरा' थी। 'पलही बयारि' एवं 'छुट्टा हरहा' इनके अन्‍य प्रमुख कविता संग्रह हैं। इनकी तमाम रचनाऍं आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से प्रसारित हो चुकी हैं।

श्री लाल अवधी भाषा में प0 चन्‍द्रभूषण त्रिवेदी 'रमई काका' की परम्‍परा के कवि हैं। इनकी कविताओं में ग्रामीण जीवन के विविध रंग देखने को मिलते हैं। हास्‍य इनकी कविता का प्रमुख रस है।

यहॉं प्रस्‍तुत है उनके कविता संग्रह 'छुट्टा हरहा' की एक कविता 'हाल अब सबका भवा बेहाल' जिसमें भीषण गर्मी की ऋतु का वर्णन किया गया है-

गरम-रितु नाचै ताल-बेताल।
हाल अब सबका भवा बेहाल।

गरम ते तिनकौ रहा न जाय।
दुपहरी झल-झल-झल झल्‍लाय।
चराचर, जीव-जन्‍तु कुम्हिलॉंय।
कुसी-कासा तक गये झुराय।

झुरानें नदिया-नरवा-ताल।
हाल अब सबका भवा बेहाल।

भानु तनि ऑंख रहा देखाय।
घामु खुब अगिनि रहा बरसाय।
जरैं भुलभुलि मा दून्‍हौं पॉंय।
कनपटा-फार लूकु हहराय।

कुँवन का पानी गवा पताल।
हाल अब सबका भवा बेहाल।

बइठि गै कतहूँ हवा लुकाय।
पसीना चपर-चपर चुचुहाय।
अँधोरिया रहि-रहि धरि-धरि खॉंय।
घरइतिनि बेनिया दियो डोलाय।

छिदी सबधरि देहीं कै खाल।
हाल अब सबका भवा बेहाल।

इ आतप सबका रही सताय।
मुला कुछु का कसिके फलियाय।
धतूरा, छ्यूल, अर्क घघ्‍घाय।
भटकटइया खुलि के मुसकाय।

गरम होइगें 'गुदड़ी के लाल'।
हाल अब सबका भवा बेहाल।



सोमवार, 16 मई 2011

उठो लाल अब ऑंखें खोलो

बेटे को थपकी देकर सुलाने वाली मॉं की कई प्रकार की लोरियां तो आपने सुनी होंगी। मगर क्‍या बच्‍चे को जगाने वाली कोई कविता सुनी है। मैनें बचपन में ऐसी एक कविता अपने हिन्‍दी पाठ्यक्रम में पढी थी जो खड़ी बोली हिन्‍दी के महाकवि अयोध्‍या सिंह उपाध्‍याय 'हरिऔध' जी ने लिखी थी। आप भी पढि़ए और बताइये कैसी लगी- 

उठो लाल अब ऑंखें खोलो।
पानी लाई हूँ मुँह धो लो।
बीती रात कमल दल फूले।
उनके ऊपर भँवरे झूले।
चिडि़यां चहक उठीं पेड़ों पर।
बहने लगी हवा अति सुन्‍दर।
नभ में प्‍यारी लाली छाई।
धरती ने प्‍यारी छवि पाई।
भोर हुआ सूरज उग आया।
जल में पड़ी सुनहरी छाया।
ऐसा सुन्‍दर समय न खोओ।
मेरे प्‍यारे अब मत सोओ।










मंगलवार, 26 जनवरी 2010

वर्ष २००९ में हिंदी साहित्य: एक नज़र में.

वर्ष २००९ हिंदी साहित्य के लिए मिला जुला रहा। कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों की रचनायें आई तो कुछ नए रचनाकारों ने भी साहित्य जगत में अपनी उपस्थिति का एहसास कराया। कुल मिलकर कोई एक रचना ऐसी नहीं रही जिसकी चर्चा वर्ष भर साहित्य के गलियारों में हुई हो। फिर भी कुछ सराहनीय रचनायें विभिन्न विधाओं में लिखी गयीं जिनमें से प्रमुख रचनाओं का नीचे उल्लेख किया जा रहा है.
आलोचना
आलोचना की विधा में जो पुस्तकें २००९ में आई और चर्चित हुईं उनमें मुख्या हैं- 11
1- बालकृष्ण भट्ट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ-
अभिषेक रोशन द्वारा रचित इस पुस्तक में हिंदी आलोचना के इतिहास को अपने समग्र रूप में प्रस्तुत करने का यथासंभव प्र्रयास हुआ है।
२- उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता -
लखनऊ के वीरेंद्र यादव द्वारा लिखित इस पुस्तक को पढने से ताजगी का एहसास होता है।
३- साधारण की प्रतिज्ञा, इतिहास:संयोग और सार्थकता, हिंदी कहानी: रचना और परिस्थिति"-
स्व० सुरेन्द्र चौधरी की तीन किताबों की सीरिज़ जो अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित है। चौधरी जी की अधिकांश लेखन सामग्री बिखरी हुई है। इस लिहाज़ से यह पुस्तक-त्रयी बहुत महत्वपूर्ण है।
उपन्यास

१- जोखिम-
वरिष्ठ कथाकार हृदयेश का आत्मकथात्मक उपन्यास जोखिम काफी चर्चित रहा है।
२- उधर के लोग-
अजय नावरिया द्वारा लिखित इस उपन्यास में मिटटी की सोंधी महक की अनुभूति होती है।
३- मिला जुला मन-
वरिष्ठ लेखिका मृदुला गर्ग के इस उपन्यास में हमेशा की तरह मध्यवर्गीय जीवन की झांकी दिखाई देती है।
४- ग्लोबल गाँव के देवता-
झारखण्ड के लेखर रणेंद्र ने अपने इस उपन्यास में आदिवासियों के शोषण और दमन का जो चित्र खींचा है वोह वाकई सराहनीय है।
५- दुक्खं सुक्क्हम
हिंदी की एक और वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया का यह उपन्यास भी वर्ष २००९ की पठनीय कृतियों में है।
६- मुक्तिबोध-
जाने मने लेखक विजय का यह उपन्यास अपने अन्दर तमाम ज्वलंत मुद्दों को समेटे हुए है। किन्तु यदि यह इस उपन्यास की विशेषता है तो यही इसकी कमजोरी भी है।

कहानी

१- सौरी की कहानियां
नवीन नैथानी का यह कहानी संग्रह रोमांटिकता, रहस्य और स्थानीय रंग का परिपूर्ण है।
२- अपने अपने सपने
जाने माने हास्य व्यंग्य के लेखक घनश्याम अग्रवाल का यह लघुकथा संग्रह सराहनीय है।
३- नया ब्राह्मण-
दलित लेखक सूरजपाल चौहान कइ इस कहानी संग्रह ने भइ लोगों का ध्यान अपनी और खींचा है।
इसके अतिरिक्त 'वसुधा' पत्रिका के कहानी पर आधारित दो विशेषांक और 'नया ज्ञानोदय' के कहानी विशेषांक भी उल्लेखनीय हैं।

कविता

१- चाँद में अटकी पतंग-
राकेश रंजन के इस कविता संग्रह में भदेस भाषा का बहुत रचनात्मक प्रयोग हुआ है।
२- एक दुनिया है असंख्य -
सुन्दर चन्द् ठाकुर द्वारा रचित यह कविता संग्रह वर्ष २००९ में चर्चित रहा।
३- मरते हैं पर शहंशाह सो रहे थे -
उमाशंकर चौधरी के इस संग्रह में मिथिलांचल के लोकरंग और वास्तविकता की झलक मिलती है।
४- अस्पताल के बहआर टेलीफोन -
युवा कवी पवन कारन की यह कृति भी पठनीय है।
५- बोलती चुप्पी -
कवयित्री सुधा उपाध्याय का यह पहला कविता संग्रह है। इसमें एक ही मानवीय रिश्ते को अलग अलग नज़रिए से देखने की कोशिश की गयी है।

उपरोक्त विधाओं के अतिरिक्त यात्रा वृत्त में जे पी भटनागर की कृति 'सिन्धु के तट से' उल्लेखनीय है जिसमे लेखक की गाजीआबाद से सिन्धु नदी के तक की स्कूटर से कठिन यात्रा के संस्मरण हैं।
पुष्पराज द्वारा लिखित "नंदीग्राम डायरी" भी उल्लेखनीय है। हालांकि बहुत से लोग लेखक की स्थापनाओं से सहमत नहीं होंगे लेकिन घटनास्थल पर जोखिम उठाकर लिखी गयी इस कृति को अनदेखा नहीं किया जा सकता।