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शुक्रवार, 29 मई 2009

हिन्दीभाषी मंत्रियों का अंग्रेज़ी में शपथ ग्रहण

केंद्रीय मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण समारोह में इस बार कई युवा चेहरों को शपथ ग्रहण करते देखकर ऐसा लगा मानो भारतीय राजनीति की बगिया में ताज़ा हवा का झोंका आया हो। यह निश्चय ही भारतीय राज्ज्निती में युवा शक्ति की बढती भागीदारी का संकेत है। देखना यह है कि युवा पीढी देश कि राजनीति को किस दिशा में ले जाती है।

अभी हाल ही में पूर्वोत्तर भारत में कुछ हिन्दीभाषी लोगों कि हत्या कर दी गई थी। आम चुनावों कि सरगर्मी और आई पी एल के रोमांच के बीच यह ख़बर दब कर रह गई। ऐसे में मंत्रिमंडल में एक पूर्वोत्तर भारतीय सुश्री अगाथा संगमा द्वारा हिन्दी में शपथ लेना उन अलगाववादियों को मुहतोड़ जवाब है जो पूर्वोत्तर भारत से हिन्दीभाषी लोगों को भगाना चाहते हैं। इसके लिए संगमा बधाई कि पात्र हैं। विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त सलमान खुर्शीद जी ने जहाँ हिन्दी में शपथ लेकर राष्ट्रभाषा का मान बढाया वहीँ देश में ही पले बढे और पढ़े श्री प्रकाश जायसवाल जी व कई हिन्दी जानने वाले नेताओं ने अंग्रेज़ी में शपथ ली। पीड़ा तब होती है जब कोई हिन्दी जानने वाला व्यक्ति अंग्रेज़ी में बोलता है वो भी बिना ज़रूरत के। शायद उसे हिन्दीभाषी होने पर शर्मिंदगी है या वह लोगों को बताना चाहता है कि में भी अंग्रेज़ी जानता हूँ। अंग्रेज़ी न हुई कोई दुर्लभ भाषा हो गई। और अगर यह इतनी ही दुर्लभ या दुरूह भाषा है तो इसका इस्तेमाल क्यों। भाषा तो वही अच्छी है जो जन जन के बीच संवाद स्थापित कर सके।

यहाँ मैं एक बार फिर स्पष्ट कर देना चाहती हूँ कि मैं किसी भी भाषा की विरोधी नहीं हूँ। दूसरे देशों से संपर्क करने एवं ज्ञान और विज्ञानं की जानकारी लेने के लिए निश्चय ही अंग्रेजी की आवश्यकता है। लेकिन उस ज्ञान विज्ञानं को यदि भारत के जन जन तक पहुचना है तो आपको हिन्दी का सहारा लेना ही पड़ेगा क्यों कि यह भारत के बहुसंख्यक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। इसे राष्ट्रभाषा होने का गौरव प्राप्त है। यहाँ तक कि भारत में रहने वाले अंग्रेज़ीदा लोग भी हिन्दी में बात करने के लिए विवश हैं। विदेशी कंपनियां भी इस बात को समझ रही हैं। इसीलिए हर उत्पाद एवं सेवा को हिन्दी भाषा के मध्यम से भारतीय लोगों तक पहुचाने का प्रयास कर रही हैं। ऐसे में हिन्दीभाषी नेताओं का ऐसे ऊंचे मंच पर अंग्रेज़ी में शपथ लेना घोर निंदनीय कृत्य है।

1 टिप्पणी:

राहुल कौशल (जर्नलिस्ट) ने कहा…

सर्वप्रथम, आभार कि आप ने इतना प्यारा लिखा,............आपकी बात से कोई इतेफ़ाक रखता हो या नही हम ज़रूर रखते हैं हिन्दी बोलने में कुछ लोगो को एशे शर्म आती हैं जैसे अपनी पढ़ी लिखी दुल्हन के सामने गाव कि माँ आ गयी हो पर उनको क्या पता वो माँ ही हैं जिसने उनके पोतड़े धोए हैं और ९ महीने तक अपना खून देकर सीचा हैं
सुश्री अगाथा संगमा को तहेदिल से आदर देता हूँ साथ ही सलमान खुर्शीद जी जिन्होने माँ को माँ का सम्मान दिया................हमे हिन्दी बोलने में किस बात कि शर्म ये उनसे पूछा जाए जो अँग्रेज़ी के तोते हैं