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रविवार, 31 मई 2009

ऑस्ट्रेलिया में क्या हो रहा है?

ऑस्ट्रेलिया में एक के बाद एक भारतीयों पर हो रहे हमले निश्चय ही चिंता का विषय हैं। हैरानी की बात है कि एक सिख गुरु की वियेना में मौत पर इतना तांडव मचा लेकिन भारतीय छात्रों पर ऑस्ट्रेलिया में हो रहे लगातार हमलों को लेकर कोई उग्र प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली। हमारे यहाँ धर्मं, जाति, भाषा आदि राष्ट्रीयता से बड़े मुद्दे हैं। भाषा और क्षेत्र को लेकर बवाल खड़ा करने वाले मनसे जैसे तुच्छ राजनीतिक दल और तमिल मुद्दे को लेकर वोट की राजनीति करने वाले तथाकथित दक्षिण भारतीय राजनीतिक दल इस घटना पर मौन हैं। शायद इस मुद्दे में उन्हें वोट की गुंजाइश नज़र नहीं आती क्यों ऐसे दलों का अस्तित्व केवल एक क्षेत्र विशेष तक सीमित है। हालाँकि भारत सरकार ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया है और ऑस्ट्रेलिया से जवाब तलब किया है। इस सबके बीच ख़बर आई है कि अभिनय सम्राट अमिताभ बच्चन ने ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हो रहे हमलों के विरोध में ऑस्ट्रेलिया सरकार द्वारा दी जाने वाली मानद उपाधि लेने से इंकार कर दिया है। उनके जैसे लोकप्रिय व्यक्ति से ऐसे ही कदम की उम्मीद थी।

यह पहला मौका नहीं है जब ऐसी कोई घटना घटी है और न ही यह सिर्फ़ ऑस्ट्रेलिया में हुआ है। अमेरिका, ब्रिटेन सहित यूरोप के कई देशों में भारतीयों पर हमले हुए हैं। लेकिन यहाँ पर प्रश्न यह उठता है कि आख़िर ये हमले क्यूँ हो रहे हैं? मेरी समझ से इसका तात्कालिक कारन है आर्थिक असुरक्षा की भावना। भारतीयों ने पूरी दुनिया में अपनी मेधा का लोहा मनवाया है। विदेशों में हजारों भारतीयों ने नौकरी हथिया कर वहां के लोगों के लिए रोज़गार का संकट खड़ा कर दिया है। मंदी के इस दौर में वैसे भी रोज़गार के अवसर कम हैं। इसलिए वहां के बेरोजगार लोग भारतीयों को निशाना बना रहे हैं। दूसरा कारण है आतंकवाद। अमेरिका में ९/११ की घटना के बाद से यूरोप के लोग हर विदेशी को एक संदिग्ध आतंकवादी के रूप में देखते हैं और उनका राष्ट्रवाद उग्र रूप लेकर हिंसा के रूप में सामने आता है। एक अन्य कारण है नस्लवाद या गोरे-काले का भेदभाव। यह सबसे पुराना कारण रहा है और मानवता को सदियों पीछे धकेलने वाली अवधारणा है।

आज ज़रूरत इस बात की है की आम जनता और सभी राजनीतिक दल एक स्वर से भारतीयों पर हो हमलों का हर स्तर पर विरोध करें ताकि विदेशों में रह रहे हमारे भारतीय भाई बहन अपने को अकेला और असुरक्षित न महसूस कर सकें। साथ ही हमें आत्म-मंथन करने की भी आवश्यकता है। हमें यह भी गौर करना चाहिए की भारत में आने वाले विदेशियों के साथ हम कैसा व्यवहार करते हैं? अभी हाल में में जिस तरह से विदेशी पर्यटकों खासकर महिलाओं के साथ लूटपाट और छेड़छाड़ की घटनाएं बढ़ी हैं उससे भारत की छवि को धक्का पंहुचा है। सरकार को विदेशी पर्यटकों की सुरक्षा के भी पुख्ता इन्तेज़ाम करने चाहिए ताकि जब वे यहाँ से वापस जायें तो भारत की एक अच्छी छवि अपने मन में लेकर जायें।

2 टिप्‍पणियां:

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र ने कहा…

आपके विचारो से सहमत हूँ . इसका प्रबल विरोध किया जाना चाहिए . सामयिक पोस्ट के लिए धन्यवाद.

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

जब हम लोग अभी तक अपने घर में इस प्रकार की घटनाओं को रोकने में समर्थ नहीं हो पाए हैं तो दूसरों को दोष देने का भी हमें कोई अधिकार नहीं है।
पहले अपने आपमें सुधार किया जाए, तभी दूसरे को सुधरने की शिक्षा देनी चाहिए।